हरिद्वार के पवित्र गंगा तट पर स्थित खड़खड़ी श्मशान घाट में इस बार होली का रंग कुछ अलग ही अंदाज में दिखाई दिया। जहां एक ओर जलती चिताओं की आंच और राख की धूसर परतें थीं, वहीं दूसरी ओर ढोल-नगाड़ों की थाप और गुलाल की उड़ती लालिमा।
यह आयोजन था किन्नर समाज और किन्नर अखाड़ा द्वारा मनाई जाने वाली पारंपरिक ‘मसान होली’ का।

राख से शुरू हुआ उत्सव:-
बैंड-बाजों की गूंज के बीच किन्नर समाज के संत और सदस्य जुलूस की शक्ल में घाट पर पहुंचे। सबसे पहले चिता की राख को नमन किया गया। विधिवत पूजा-अर्चना के बाद उसी राख को पवित्र प्रतीक मानकर माथे पर लगाया गया।
इसके बाद गुलाल और राख का संगम हुआ। एक-दूसरे को रंग लगाकर होली की शुभकामनाएं दी गईं। श्मशान जैसे गंभीर स्थल पर यह दृश्य कुछ देर के लिए वहां मौजूद लोगों को चौंका गया।
जीवन और मृत्यु के बीच रंगों का संवाद:-
जलती और बुझी चिताओं के समीप रंग खेलते किन्नरों को देखकर वहाँ मौजूद कई लोग पहले तो ठिठक गए, लेकिन फिर इस परंपरा के पीछे छिपे संदेश को समझते नजर आए। यह केवल होली नहीं थी, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच एक प्रतीकात्मक संवाद था। जहां राख यह याद दिलाती है कि शरीर नश्वर है, और रंग बताते हैं कि जब तक जीवन है, तब तक प्रेम और उत्सव है।
परंपरा का आध्यात्मिक अर्थ:-
किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर भवानी माता ने बताया कि मसान होली वर्षों पुरानी परंपरा है। उनके अनुसार, श्मशान की राख मनुष्य को उसके अहंकार से मुक्त होने की सीख देती है। यह बताती है कि अंततः सब कुछ इसी राख में विलीन होना है, इसलिए जीवन को प्रेम और करुणा के साथ जीना चाहिए।
वहीं महामंडलेश्वर पूनम किन्नर ने कहा कि श्मशान मोक्ष का द्वार है। होली जैसे पावन पर्व पर यह संदेश देना जरूरी है कि मन के द्वेष और भेदभाव को भी उसी तरह जला देना चाहिए, जैसे चिता में देह जलती है।
एक अलग तरह की होली :-
जहां आमतौर पर होली रंग, पानी और संगीत का उत्सव होती है, वहीं मसान होली जीवन की अस्थिरता का बोध कराती है। यह परंपरा समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि जब अंत सबका एक जैसा है, तो फिर जीवन में भेदभाव और द्वेष क्यों?
खड़खड़ी श्मशान घाट पर खेली गई यह होली केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि वैराग्य और प्रेम का संगम बन गई। जहां राख और गुलाल ने मिलकर जीवन का सबसे गहरा सत्य सामने रखा।


