उत्तराखंड के नैनीताल जिले के बिंदुखत्ता को राजस्व गांव घोषित करने और क्षेत्र को आरक्षित वन सूची से बाहर करने की मांग एक बार फिर सड़कों पर दिखाई दी। शुक्रवार को हजारों ग्रामीण, महिलाएं और युवा लालकुआं तहसील परिसर पहुंचे और सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। वनाधिकार समिति बिंदुखत्ता के बैनर तले जुटे लोगों ने ‘बिंदुखत्ता को राजस्व गांव बनाओ’ के नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों का कहना है
कि चुनाव के समय विधायक और सांसद राजस्व गांव बनाने का वादा कर वोट तो ले लेते हैं, लेकिन सरकार बनने के बाद वादे भुला दिए जाते हैं। ग्रामीणों ने साफ शब्दों में कहा कि राजस्व गांव से कम उन्हें कुछ भी मंजूर नहीं है। यदि सरकार ने जल्द ठोस फैसला नहीं लिया तो आंदोलन को नैनीताल से देहरादून तक ले जाया जाएगा।
25 साल में कई घोषणाएं, जमीन पर नतीजा शून्य
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि उत्तराखंड बने 25 साल हो चुके हैं और इस दौरान कई मुख्यमंत्री बदले, लेकिन बिंदुखत्ता को राजस्व गांव बनाने की घोषणा सिर्फ कागजों तक सीमित रही। ग्रामीणों का आरोप है कि हर चुनाव से पहले आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं। अब धैर्य की सीमा टूट चुकी है और बड़ा आंदोलन तय है।
कमेटी बनी, रिपोर्ट गई, डेढ़ साल बाद आपत्ति
राजस्व गांव को लेकर पहले एक समिति गठित की गई थी। समिति की रिपोर्ट जिलाधिकारी के माध्यम से सरकार तक भेजी गई। ग्रामीणों का कहना है कि रिपोर्ट भेजे जाने के करीब डेढ़ साल बाद उस पर आपत्ति लगा दी गई, जिससे पूरा मामला फिर लटक गया। इसी वजह से लोगों में भारी नाराजगी और चिंता है।
बिंदुखत्ता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
हल्द्वानी से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित बिंदुखत्ता को प्रदेश के सबसे बड़े गांवों में गिना जाता है। इसकी आबादी करीब 80 हजार के आसपास है। बताया जाता है कि गांव की बसासत वर्ष 1932 से है, जब पहाड़ों से बड़ी संख्या में लोग पलायन कर यहां आकर बसे। वर्ष 1965-66 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने करीब 35 हजार हेक्टेयर क्षेत्र को बिना बंदोबस्ती के आरक्षित वन घोषित कर दिया। जबकि इससे पहले यहां पशुपालन होता था और चराई माफ की गई थी। 1952 में यहां पहला राजकीय प्राथमिक विद्यालय भी स्थापित किया गया।
सुविधाएं हैं, लेकिन अधिकार नहीं
लगभग 80 हजार की आबादी वाले इस क्षेत्र में स्कूल, आईटीआई कॉलेज, बैंक, स्वास्थ्य केंद्र, सड़क और बिजली जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। इसके बावजूद राजस्व गांव का दर्जा न होने से लोग कई सरकारी लाभों से वंचित हैं।
ग्रामीण लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वोट डालते हैं, लेकिन पंचायत चुनावों में मतदान का अधिकार नहीं है। इसी कारण लोग आज भी खुद को शरणार्थी जैसा महसूस करते हैं। यहां की 65 से 70 फीसदी आबादी सैनिक और पूर्व सैनिक परिवारों की है। अशोक चक्र विजेता शहीद मोहन नाथ गोस्वामी समेत 18 वीर सैनिकों के नाम से भी बिंदुखत्ता जाना जाता है।
तीन मुख्यमंत्रियों की घोषणा, अमल अब तक नहीं
बिंदुखत्ता को राजस्व गांव बनाने की पहली घोषणा 2009 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी ने की थी। दूसरी घोषणा 2011 में मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने की। तीसरी और ताजा घोषणा 20 फरवरी 2024 को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने की, जिससे लोगों में उम्मीद जगी। लेकिन 2027 में चुनाव नजदीक आने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जिससे आक्रोश बढ़ गया है।
नगर पालिका बनी, फिर जनता के दबाव में हुई निरस्त
25 जनवरी 2015 को कांग्रेस सरकार के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने बिंदुखत्ता को नगर पालिका घोषित किया था। हालांकि ग्रामीणों ने इसका विरोध किया, क्योंकि उनकी मुख्य मांग राजस्व गांव की थी। जनता के भारी विरोध के बाद 8 दिसंबर 2016 को सरकार ने नगर पालिका से जुड़ा शासनादेश निरस्त कर दिया।



